Bihar Board Class 9th chapter 2 अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम | Ameriki swatantrata sangram class 9th History Notes & Solution
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Bihar Board Class 6th History Social Science Chapter 8 Notes नए प्रश्न, नवीन विचार | Naye Prashn, Naye Vichar Objective Question

आज के इस पोस्ट में हमलोग कक्षा 6वीं इतिहास का पाठ ‘नए प्रश्न, नवीन विचार’ का नोट्स को देखने वाले है। Naye Prashn, Naye Vichar 

नए प्रश्न, नवीन विचार

उत्तर वैदिक काल में बदलाव

(i) उत्तर वैदिक काल (1000–600 ई.पू.) में लोहे का उपयोग बहुत बढ़ गया।
(ii) लोहे के औजारों से जंगल आसानी से काटे गए।
(iii) खेती का क्षेत्र बढ़ा।
(iv) कृषि उत्पादन (फसल) अधिक होने लगा।
(v) इससे लोगों की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई।
(vi) नए-नए व्यवसाय, व्यापार और वाणिज्य का विकास हुआ।
(vii) सिक्कों का चलन शुरू हुआ।
(viii) नगर (शहर) बसने लगे।
(ix) पहले वर्ण व्यवस्था कर्म (काम) के आधार पर होती थी, लेकिन बाद में यह जन्म के आधार पर होने लगी। समाज चार वर्णों में बँटा था— ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।

ब्राह्मण और क्षत्रियों की स्थिति

ब्राह्मणों का समाज में सबसे ऊँचा स्थान था। उन्हें सबसे अधिक सम्मान और सुविधाएँ मिलती थीं तथा धर्म और समाज पर उनका सबसे अधिक प्रभाव था। क्षत्रियों को भी सम्मान और सुविधाएँ मिलती थीं, लेकिन उनका स्थान ब्राह्मणों से नीचे था।

वैश्य और शूद्रों की स्थिति

वैश्यों ने व्यापार और खेती से बहुत धन कमाया। कुछ व्यापारी तो राजाओं से भी अधिक अमीर थे, फिर भी वर्ण व्यवस्था में उनका स्थान तीसरा ही था। शूद्रों की स्थिति सबसे दयनीय थी। उन्हें समाज में बराबरी का अधिकार नहीं मिलता था और उनके साथ भेदभाव किया जाता था।

समाज की बुराइयाँ

(i) समाज में जाति प्रथा और दिखावा बढ़ गया।
(ii) कर्मकांड (बड़े-बड़े धार्मिक अनुष्ठान) बढ़ गए और महंगे यज्ञ होने लगे।
(iii) यज्ञों में पशुओं की बलि दी जाती थी, जिससे बहुत-से पशु मारे जाने लगे।
(iv) आम लोगों के लिए धर्म का पालन कठिन हो गया। लोग ऐसा धर्म चाहते थे जिसमें सभी लोगों के लिए समान स्थान हो।

👉 लगभग 600 ई.पू. के आसपास उपनिषदों का संकलन हुआ। उपनिषद उत्तर वैदिक ग्रंथों का भाग हैं। उपनिषद का शाब्दिक अर्थ है— “गुरु के पास बैठकर ज्ञान प्राप्त करना।” उपनिषद में अधिकतर बातें प्रश्न-उत्तर या वार्तालाप के रूप में हैं।

उपनिषदों में आत्मा, परमात्मा, ब्रह्म, जीवन और मृत्यु, ज्ञान और सत्य आदि विषयों पर चर्चा की गई है।

गर्गी एक प्रसिद्ध विदुषी (ज्ञानी महिला) थीं। वे राजाओं के दरबार में होने वाले विद्वानों के वाद-विवाद (शास्त्रार्थ) में भाग लेती थीं। याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी थी।

सत्यकाम जाबाल एक गरीब परिवार के थे। उन्हें सत्य जानने की इच्छा हुई। वे गौतम ब्राह्मण के पास गए। और गौतम ने उन्हें अपना शिष्य बना लिया। आगे चलकर सत्यकाम जाबाल अपने समय के प्रसिद्ध विचारक बने।

नचिकेता की कहानी

नचिकेता एक साहसी और जिज्ञासु बालक था। उसके मन में प्रश्न उठा कि मरने के बाद क्या होता है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए वह यमराज के पास गया। यमराज ने उसे सोना, चाँदी और गायों का लालच दिया, लेकिन नचिकेता अपने प्रश्न पर अडिग रहा। उसकी सच्चाई और साहस से प्रसन्न होकर यमराज ने बताया कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है; शरीर नष्ट हो जाता है, लेकिन आत्मा अमर रहती है।

गौतम बुद्ध

गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में नेपाल की तराई में स्थित कपिलवस्तु के लुंबिनी वन में हुआ था। उनके पिता का नाम शुद्धोधन, माता का नाम महामाया तथा बचपन का नाम सिद्धार्थ था। आगे चलकर उनका विवाह यशोधरा से हुआ और उनके पुत्र का नाम राहुल था।

वे बचपन से ही चिंतनशील थे। लोगों के दुःख देखकर उन्होंने सत्य की खोज के लिए घर छोड़ दिया। छह वर्ष की तपस्या के बाद बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और वे बुद्ध कहलाए। और उनके अनुयायी बौद्ध कहलाए।

उन्होंने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया, जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है। बाद में सम्राट अशोक ने इस घटना की स्मृति में सारनाथ में एक विशाल स्तूप का निर्माण करवाया।

बुद्ध धर्म का प्रचार

(i) ज्ञान प्राप्त करने के बाद बुद्ध ने मगध, वैशाली और भारत के अन्य स्थानों पर घूम-घूमकर अपने उपदेश दिए।

(ii) उनकी शिक्षाएँ लोगों को पसंद आईं, इसलिए बौद्ध धर्म बहुत जल्दी लोकप्रिय हो गया।

(iii) 80 वर्ष की आयु में 483 ई.पू. में कुशीनगर (गोरखपुर) में बुद्ध का महापरिनिर्वाण (मृत्यु) हुआ।

(iv) मगध के राजा बिम्बिसार बुद्ध के प्रमुख अनुयायी बने।

बुद्ध की शिक्षाएँ

(i) बुद्ध ने जाति-पाति, ऊँच-नीच के भेदभाव और कठिन धार्मिक कर्मकांडों का विरोध किया।

(ii) उनके अनुसार मनुष्य अच्छा या बुरा उसके व्यवहार से पहचाना जाता है, जन्म या जाति से नहीं।

(iii) बुद्ध के सिद्धांतों को समाज का कोई भी व्यक्ति अपना सकता था।

(iv) उन्होंने सभी मनुष्यों, पशुओं और पक्षियों के प्रति दया और प्रेम रखने की शिक्षा दी।

(v) बुद्ध लोगों से कहते थे कि किसी भी बात को बिना सोचे-समझे न मानें, बल्कि अपने विवेक से सही-गलत का निर्णय करें।

(vi) बुद्ध ने अपने उपदेश पाली भाषा में दिए। उनकी भाषा बहुत सरल थी, इसलिए सामान्य लोग भी आसानी से समझ जाते थे।

स्तूप = भगवान बुद्ध तथा बौद्ध भिक्षुओं की मृत्यु के बाद उनके शारीरिक अवशेषों (अस्थियों आदि) पर बनाई गई गोलाकार स्मारक संरचना को स्तूप कहते हैं।

जीवों पर दया (कहानी)

एक दिन भगवान बुद्ध भिक्षा माँगने जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने एक गड़रिये को भेड़ों के साथ जाते देखा। एक छोटे मेमने के पैर में चोट लगी थी, इसलिए वह ठीक से चल नहीं पा रहा था। उसकी तकलीफ़ देखकर बुद्ध को दया आ गई। उन्होंने मेमने को अपनी गोद में उठा लिया और उसे लेकर चलने लगे। इस घटना से पता चलता है कि भगवान बुद्ध सभी जीवों पर दया और प्रेम करते थे।

चार आर्य सत्य

(i) दुःख – बुद्ध के अनुसार जन्म, मृत्यु, बीमारी और मनचाही वस्तु न मिलना सभी दुःख हैं।
(ii) दुःख का कारण – दुःख का मुख्य कारण इच्छा (तृष्णा) है।
(iii) दुःख का निवारण – इच्छाओं पर नियंत्रण करके दुःख को दूर किया जा सकता है।
(iv) दुःख दूर करने का मार्ग – दुःखों से मुक्ति पाने का मार्ग अष्टांगिक मार्ग (मध्यम मार्ग) है।

अष्टांगिक (मध्यम) मार्ग = अष्टांगिक (मध्यम) मार्ग वह मार्ग है, जिसे भगवान बुद्ध ने मनुष्य को दुःखों से मुक्ति और शांति (निर्वाण) प्राप्त करने के लिए बताया। इस मार्ग में आठ अच्छे नियमों का पालन करना होता है।

अष्टांगिक (मध्यम) मार्ग के आठ नियम

(i) सम्यक दृष्टि – सत्य, असत्य, पाप, पुण्य, अच्छे और बुरे का सही ज्ञान रखना सम्यक दृष्टि कहलाता है।

(ii) सम्यक संकल्प – मन में अच्छे, शुद्ध और अहिंसा के विचार रखना सम्यक संकल्प कहलाता है।

(iii) सम्यक वाणी – मनुष्य को हमेशा सत्य, मीठा और विनम्र बोलना चाहिए।

(iv) सम्यक कर्म – मनुष्य को अपने जीवन में हमेशा अच्छे और सही कार्य करने चाहिए।

(v) सम्यक आजीविका – मनुष्य को ईमानदारी और सही साधनों से जीविका कमानी चाहिए।

(vi) सम्यक व्यायाम – मनुष्य को बुरे विचारों और बुरी आदतों को दूर करने का लगातार प्रयास करना चाहिए।

(vii) सम्यक चरित्र – मनुष्य को हमेशा अच्छा आचरण और अच्छा व्यवहार अपनाना चाहिए।

(viii) सम्यक समाधि – मन को एकाग्र करके सही बातों पर ध्यान और चिंतन करना चाहिए।

इन आठ बातों का पालन करने से मनुष्य दुःखों से मुक्त होकर शांति और आनंद (निर्वाण) प्राप्त कर सकता है।

बुद्ध ने बौद्ध संघ की स्थापना की। इसमें सभी जातियों के पुरुष और महिलाएँ शामिल हो सकते थे। संघ के लोग सादा जीवन जीते थे और अपनी आवश्यकताएँ कम रखते थे। वे अपनी जरूरतों के लिए भिक्षा माँगते थे। पुरुषों को भिक्षु और महिलाओं को भिक्षुणी कहा जाता था। और जहाँ वे रहते थे, उसे विहार कहा जाता था।

जैन धर्म

(i) इसी समय जैन धर्म भी अपनी नई विचारधारा से लोगों को प्रभावित कर रहा था। जैन शब्द “जिन” से बना है, जिसका अर्थ है “जीतने वाला“।

(ii) जैन धर्म के संस्थापक ऋषभदेव माने जाते हैं। जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए हैं। तीर्थंकर का अर्थ है— धर्म का प्रचार करने वाला और लोगों को सही मार्ग दिखाने वाला।

(iii) 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे, जो काशी के राजा अश्वसेन के पुत्र थे। 24वें और अंतिम तीर्थंकर महावीर थे, जिन्होंने जैन धर्म का सबसे अधिक प्रचार-प्रसार किया।

महावीर

(i) महावीर का मूल नाम वर्धमान था। इनका जन्म 540 ई.पू. में वैशाली के पास कुंडग्राम में हुआ था।

(ii) इनके पिता का नाम सिद्धार्थ था, जो ज्ञातृक (जातक) क्षत्रिय कुल के प्रधान थे। उनकी माता का नाम त्रिशला था, जो वैशाली की लिच्छवी राजकुमारी थीं।

(iii) सत्य का ज्ञान प्राप्त करने के बाद वर्धमान महावीर कहलाए। 72 वर्ष की आयु में 468 ई.पू. में पावापुरी में उनका निधन (मृत्यु) हुआ।

महावीर की शिक्षाएँ

(i) भगवान बुद्ध की तरह महावीर के उपदेश भी बहुत सरल थे। जैन धर्म में सदाचार (अच्छे आचरण) पर विशेष बल दिया गया है।

(ii) महावीर का मानना था कि पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों और हवा में रहने वाले छोटे-छोटे अदृश्य जीवों में भी जीवन होता है। इसी कारण जैन साधु मुँह और नाक पर कपड़ा बाँधकर चलते हैं, ताकि कोई छोटा जीव उनकी साँस से मर न जाए।

(iii) भगवान बुद्ध ने भी अहिंसा अपनाने की शिक्षा दी थी। सच्चा जीवन जीने के लिए क्रोध, लोभ और भय का त्याग करना चाहिए।

महावीर की राय

(i) महावीर ने चोरी न करने की शिक्षा दी। बिना अनुमति किसी की वस्तु नहीं लेनी चाहिए।

(ii) उन्होंने ईमानदारी पर जोर दिया। उन्होंने आवश्यकता से अधिक धन का संग्रह न करने की शिक्षा दी।

(iii) महावीर ने ब्रह्मचर्य का पालन करने पर बल दिया। ब्रह्मचर्य का अर्थ है अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखना।

(iv) महावीर ने अपने उपदेश प्राकृत भाषा में दिए। मगध में बोली जाने वाली प्राकृत भाषा को मागधी कहा जाता था।

(v) महावीर ने सभी मनुष्यों को समान माना। उन्होंने स्त्रियों को भी पुरुषों के समान संघ में प्रवेश करने की अनुमति दी।

(vi) बुद्ध और महावीर दोनों का मानना था कि घर का त्याग करने से सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है।

जैन धर्म के तीन मार्ग (त्रि-रत्न)

(i) सम्यक दर्शन = सभी जीवों में आत्मा होती है, इसलिए हर प्राणी को अपने समान समझना सम्यक दर्शन कहलाता है।

(ii) सम्यक ज्ञान = सही ज्ञान प्राप्त करके अज्ञान, क्रोध, लोभ और मोह से मुक्त होना सम्यक ज्ञान कहलाता है।

(iii) सम्यक चरित्र = अच्छा आचरण, अच्छा व्यवहार तथा अपने विचारों और वाणी पर नियंत्रण रखना सम्यक चरित्र कहलाता है।

जैन धर्म में सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र को मिलाकर त्रि-रत्न कहा जाता है। जैन धर्म के अनुसार त्रि-रत्न का पालन करने से मनुष्य जीवन-मरण के दुःखों से मुक्ति (मोक्ष) प्राप्त कर सकता है।

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दोस्तों उम्मीद करता हूं कि ऊपर दिए गए कक्षा 6वीं के इतिहास के पाठ 08 नए प्रश्न, नवीन विचार (Naye Prashn, Naye Vichar) का नोट्स और उसका प्रश्न को पढ़कर आपको कैसा लगा, कॉमेंट करके जरूर बताएं। धन्यवाद !

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