Bihar Board Class 9th chapter 2 अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम | Ameriki swatantrata sangram class 9th History Notes & Solution
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Bihar Board Ncert Class 9th Science Biology Chapter 3 Notes jivo me vividhta | जीवों में विविधता Objective Question

आज के इस पोस्ट में हमलोग कक्षा 9वीं जीव विज्ञान का पाठ ‘जीवों में विविधता’ का नोट्स को देखने वाले है। jivo me vividhta

Bihar Board Ncert Class 9th Science Biology Chapter 3 Notes jivo me vividhta | जीवों में विविधता Objective Question

जीवों में विविधता

☛ हमारे चारों ओर तरह-तरह के जीव पाए जाते हैं। जिनका आकार, आकृति, रंग, भोजन और रहने का स्थान अलग-अलग होता है। कुछ जीव इतने छोटे होते हैं कि बिना सूक्ष्मदर्शी या इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के दिखते ही नहीं देंगे।

☞ सभी जीव एक-दूसरे से भिन्न तो होते हैं, लेकिन कुछ में समानताएँ भी होती हैं। जैसे– आदमी और बंदर में ज्यादा समानता है। और लाखों जीवों का एक-एक करके अध्ययन करना मुश्किल है। इसलिए जीवों को उनकी समानताओं के आधार पर समूहों में बाँटा जाता है।

प्रश्न 1. वर्गीकरण किसे कहते है?
उत्तर– जब जीवों की विविधता को समझने के लिए हम उन्हें समानताओं और असमानताओं के आधार पर अलग-अलग समूहों में बाँटते हैं, तो उसे वर्गीकरण (classification) कहते हैं।

प्रश्न 2. वर्गिकी या वर्गीकरणविज्ञान किसे कहते है?
उत्तर– जीव विज्ञान की वह शाखा जिसमें जीवों के वर्गीकरण का अध्ययन करते है, उसे वर्गिकी या वर्गीकरणविज्ञान (taxonomy) कहते हैं।

⪼ कैरोलस लिन्नियस ने 18वीं शताब्दी में वैज्ञानिक वर्गीकरण की नींव रखी, इसलिए इन्हें वर्गिकी का जनक (Father of Taxonomy) कहा जाता है।

वर्गीकरण का इतिहास

➣ अरस्तू ने जीवों को उनके रहने की जगह (जल, स्थल, वायु) के आधार पर बाँटा था। जैसे– व्हेल और स्टारफिश दोनों को एक ही समूह में रखा, क्योंकि दोनों समुद्र में रहते हैं। लेकिन यह वैज्ञानिक दृष्टि से सही नहीं था।

⪼ कैरोलस लिन्नियस के समय वर्गीकरण की 4 इकाइयाँ (संघ, वर्ग, वंश, जाति) थीं। लेकिन अब इनमें गण, कुल भी जोड़ा गया है।

जीवों का वर्गीकरण कैसे किया जाता है?

(i) कोशिका की प्रकृति के आधार पर = जीव की कोशिका प्रोकैरियोटिक है या यूकैरियोटिक है।
(ii) कोशिकाओं की संख्या के आधार पर = जीव एककोशिकीय है या बहुकोशिकीय है।
(iii) भोजन प्राप्त करने के आधार पर = क्या जीव अपना भोजन स्वयं बनाता है या दूसरों पर निर्भर करता है?

डार्विन का सिद्धांत

☛ चार्ल्स डार्विन ने 1859 में अपनी किताब “The Origin of Species” में बताया कि आज के जीव बहुत लंबे समय में प्राकृतिक बदलावों के कारण विकसित हुए हैं।

शुरूआत में वर्गीकरण

➣ कैरोलस लिन्नियस (1758) ने जीव जगत को 2 समूहों में बाँटा था:–

(i) पादप (प्लांटी) जगत = इसमें वैसे पौधे को शामिल किया गया, जो हरे होते हैं, और जिनमें क्लोरोफिल होता है तथा कोशिकाभित्ति होती है।

(ii) जंतु (एनीमेलिया) जगत = इसमें वैसे जानवर को शामिल किया गया, जो हिल-डुल सकते हैं, और जिनमें क्लोरोफिल तथा कोशिकाभित्ति नहीं होती है।

➣ बाद में कुछ ऐसे जीव मिले जो न तो पूरी तरह पौधे थे, न ही जानवर — जैसे अमीबा, पैरामीशियम आदि। इसीलिए 1866 में E.H. हिकेल ने ‘प्रोटिस्टा’ नाम का तीसरा जगत बनाया।

☛ बाद में सभी जीवों को दो बड़े समूहों (सुपर किंगडम) में बाँटा गया —

(i) प्रोकैरियोट्स = इसमें केन्द्रक (nucleus) नहीं पाए जाने वाले जीव शामिल हैं। जैसे बैक्टीरिया, सायनोबैक्टीरिया (नील-हरित शैवाल) — इन्हें मोनेरा जगत में रखा गया।

(ii) यूकैरियोट्स = इसमें केन्द्रक पाए जाने वाले जीवों को शामिल किया गया।

☞ कवक (Fungi) यूकैरियोट होते हुए भी प्रकाश संश्लेषण नहीं करते, इसलिए इन्हें अलग से ‘जगत फंजाई’ में रखा गया।

1969 में R. ह्विटेकर का पाँच-जगत वर्गीकरण

(i) मोनेरा (Monera) – इसमें एककोशिकीय और बिना केन्द्रक वाले जीव आते है। जैसे बैक्टीरिया, सायनोबैक्टीरिया

(ii) प्रोटिस्टा (Protista) – इसमें एककोशिकीय और केन्द्रक वाले जीव आते है। जैसे अमीबा, पैरामीशियम

(iii) फंजाई (Fungi) – मृत व सड़ी-गली वस्तुओं से भोजन प्राप्त करने वाले जीव आते हैं। जैसे मशरूम, यीस्ट

(iv) प्लांटी (Plantae) – इसमें सभी पौधे आते हैं। हरे, लाल, भूरे शैवाल, मॉस, फर्न, जिम्नोस्पर्म, एंजियोस्पर्म

(v) एनिमेलिया (Animalia) – इसमें सभी जानवर आते है।

1977 में कार्ल बोस का विभाजन

☛ मोनेरा को दो भागों में बाँटा गया —
(i) आर्कीबैक्टीरिया – प्राचीन बैक्टीरिया
(ii) यूबैक्टीरिया – सामान्य बैक्टीरिया

जीवों का वर्गीकरण के स्तर (आधार)

(i) जगत (Kingdom)
(ii) उपजगत (Subkingdom)
(iii) फाइलम (Phylum) या डिवीजन (Division)
(iv) वर्ग (Class)
(v) गण (Order)
(vi) कुल (Family)
(vii) वंश (Genus)
(viii) जाति (Species)

जगत मोनेरा (Kingdom Monera)

(i) इसमें पुराने प्रोकैरियोटिक (बिना केन्द्रक के) सूक्ष्मजीव को शामिल किया गया हैं। जैसे– बैक्टीरिया (जीवाणु), नील-हरित शैवाल (सायनोबैक्टीरिया), माइकोप्लाज्मा

(ii) यह जीवाणु के कई आकार होते हैं। जैसे:- कोकाई (गोल जैसा), वैसीलस (लाठी जैसे), स्पाइरिला (कॉमा या स्पाइरल जैसे)

(iii) यह अधिकतर एककोशिकीय होते हैं। इनमें कोशिकाभित्ति होती है, जबकि माइटोकॉन्ड्रिया, गॉल्जीकाय जैसे कोशिकांग नहीं होते है।

(iv) इसके कुछ जीवाणु स्वपोषी होते हैं, तो कुछ परपोषी होते हैं।

जगत प्रोटिस्टा

(i) इसमें जलीय, एककोशिकीय और यूकैरियोटिक (केन्द्रक वाला) सूक्ष्मजीव को शामिल किया गया हैं।

(ii) इसको चलने के लिए इसमें सीलिया (छोटे बाल जैसे) और फ्लैजिला पाए जाते है।

(iii) इसके कुछ जीव स्वपोषी (जैसे – डायटम, यूग्लीना) होते है, तो कुछ जीव परपोषी (परजीवी+ मृतजीवी) होते हैं। मृतजीवी सड़े-गले पदार्थों पर जीवित रहते है।

(iv) यह कई प्रकार का होता है। स्वपोषी प्रोटिस्टा (शैवाल जैसे) और प्रोटोजोआन्स (जैसे –अमीबा, पैरामीशियम)। अमीबा, कूटपाद से और पैरामीशियम सीलिया से चलता है।

फंजाई (Fungi)

(i) फंजाई जगत में ऐसे बहुकोशिकीय यूकैरियोटिक जीव आते हैं जो दिखने में पौधों जैसे होते हैं, लेकिन इनमें क्लोरोफिल (हरा वर्णक) नहीं होता है। इसलिए ये अपना भोजन खुद नहीं बना सकते हैं।

(ii) इनकी कोशिकाओं में कोशिकाभित्ति (Cell wall) होती है। इनकी कोशिकाभित्ति “काइटिन” नामक कठोर पदार्थ से बनी होती है।

(iii) ये परजीवी, सहजीवी या मृतजीवी (मरे पदार्थों पर जीवित) हो सकते हैं। और ये जीव हर जगह पाए जाते हैं।

(iv) इनका शरीर धागे जैसे जाल से बना होता है, जिसे कवकजाल (Mycelium) कहते हैं। कुछ कवकों (जैसे यीस्ट) में कवकजाल नहीं बनता है। इनमें भोजन ग्लाइकोजेन के रूप में जमा रहता है।

(v) हर कवकजाल से पतले धागे जैसे तंतु निकलते हैं जिन्हें हाइफा कहते हैं। उदाहरण: म्यूकर, पेनिसिलियम

(vi) फंजाई अपने तंतुओं को मृत कार्बनिक पदार्थों पर फैलाते हैं, और अपने पाचक एंजाइम छोड़ते हैं, जिससे पदार्थ घुलकर द्रव बन जाते हैं। फिर वे उस द्रव से पोषक तत्त्व सोख लेते हैं।

पादप जगत

☛ आइकलर ने 1883 ईस्वी में पौधों को दो उपजगतों में बाँटा —

(i) क्रिप्टोगैम्स — इसमें जड़, तना, पत्ती, बीज और संवहन तंत्र नहीं होने वाले पौधे को शामिल किया जाता है। जैसे– शैवाल, मॉस, फर्न

(ii) फैनरोगैम्स — इसमें जड़, तना, पत्ती, बीज और संवहन तंत्र होने वाले पौधे को शामिल किया जाता है। जैसे– आम, गुलाब, गेहूँ, मटर

⪼ क्रिप्टोगैम्स के तीन भाग होते है।

(i) थैलोफाइटा — इसमें जड़, तना और पत्तियाँ नहीं होतीं है। जैसे — शैवाल (Algae)

(ii) ब्रायोफाइटा – ये छोटे हरे पौधे होते हैं जो नम जगहों पर उगते हैं और जड़ जैसी संरचना होती है, लेकिन असली जड़ नहीं होती है। जैसे– मॉस (Mosses)

(iii) टेरिडोफाइटा – इन पौधों में असली जड़, तना और पत्तियाँ होती हैं, पर बीज नहीं होते है। जैसे– फर्न

☞ फैनरोगैम्स के दो भाग

(i) जिम्नोस्पर्म या अनावृतबीजी (नग्नबीजी) — ऐसे पौधे के बीज फल के अंदर नहीं होते है।

(ii) एंजियोस्पर्म या आवृतबीजी— ऐसे पौधे के बीज फल के अंदर होते है।

👉 जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म मिलकर स्पर्मेटोफाइटा कहलाते हैं, जिनमें सभी बीजयुक्त पौधे आते हैं।

थैलोफाइटा

(i) थैलोफाइटा ऐसे पौधे होते हैं जिनका शरीर जड़, तना और पत्तियों में बाँटा हुआ नहीं होता है।

(ii) पूरा पौधा एक चपटा या धागे जैसा भाग होता है जिसे थैलस कहा जाता है।, इसलिए इनका नाम थैलोफाइटा पड़ा।

(iii) इनमें संवहनीय तंत्र नहीं होता है। यानी इनमें जल और भोजन पहुँचाने वाली विशेष नलिकाएँ नहीं पाई जातीं।

(iv) थैलोफाइटा के अंतर्गत दो प्रमुख समूह आते हैं — शैवाल (Algae) और लाइकेन

शैवाल (Algae)

(i) यह जलीय पौधे होते है। और ये प्रकाशसंश्लेषण (Photosynthesis) द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, इसलिए ये स्वपोषी होते हैं।

(ii) कुछ शैवाल एककोशिकीय होते हैं — जैसे क्लेमाइडोमोनस। कुछ शैवाल समूह बनाकर रहते हैं — जैसे वॉल्वॉक्स। कुछ बहुकोशिकीय होते हैं — जैसे स्पाइरोगाइरा। कुछ शाखित (Branched) भी होते हैं — जैसे क्लैडोफोरा

(iii) शैवाल हरा, भूरा और लाल हो सकता है।लाल शैवाल से ऐगार नामक पदार्थ बनता है, जिसका प्रयोग प्रयोगशालाओं में सूक्ष्मजीवों को उगाने के लिए किया जाता है।

(iv) फ्लैजेला नामक बाल जैसे अंग इन शैवालों को पानी में तैरने में मदद करते हैं।

लाइकेन (Lichen)

(i) लाइकेन एक सहजीवी संबंध का उदाहरण है। यह दो जीव शैवाल और कवक से मिलकर बना होता है।

(ii) कवक, शैवाल को जल और खनिज देता है, जबकि शैवाल, प्रकाश संश्लेषण द्वारा कवक के लिए भोजन बनाता है।

(iii) लाइकेन अक्सर पेड़ों की छालों, पत्थरों और पुरानी दीवारों पर धूसर या हरे रंग के धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं।

ब्रायोफाइटा

(i) ये पौधे नम और छायादार स्थानों (जैसे दीवारों, पत्थरों या जंगलों की मिट्टी) पर उगते हैं। इसलिए इन्हें पादप जगत का उभयचर कहा जाता है, क्योंकि ये पानी में भी रहते हैं और जमीन पर भी।

(ii) इनका शरीर कभी-कभी थैलस जैसा होता है, और कुछ में तना व पत्तियों जैसी बनावट दिखाई देती है।

(iii) इनमें संवहन ऊतक (जाइलम और फ्लोएम) नहीं पाए जाते है, इसलिए ये पौधे बहुत ऊँचे नहीं बढ़ पाते है।

(iv) इनका मुख्य उदाहरण रिक्सिया, माँस, मार्केशिया आदि पौधे हैं।

टेरिडोफाइटा

(i) इन पौधों में असली जड़, तना और पत्तियाँ होती हैं, पर बीज नहीं होते है, इसलिए इन्हें बीजरहित पौधे कहा जाता है। जैसे– फर्न

(ii) इनके अंदर संवहन ऊतक यानी जाइलम और फ्लोएम पाए जाते हैं, जो पौधे के अंदर जल, भोजन और पोषक तत्वों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने का काम करते हैं।

(iii) ये ऐसे पहले पौधे थे जिनमें संवहन तंत्र विकसित था, इसलिए इन्हें सबसे पुराने संवहनीय पौधे कहा जाता है।

(iv) ये ज़्यादातर छायादार और नम जगहों पर पाए जाते हैं। फर्न की पत्तियाँ बड़ी होती हैं और कई छोटे पत्तों में बँटी होती हैं। पत्तियाँ जब छोटी होती हैं तो कुंडलित (घुमावदार या लिपटा हुआ) रहती हैं, जो धीरे-धीरे खुलती हैं।

(v) थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा और टेरिडोफाइटा इन तीनों को मिलाकर क्रिप्टोगैम्स कहा जाता है। और इनमें बीज नहीं होता है।

जिम्नोस्पर्म 

(i) “जिम्नो” का अर्थ होता है नग्न (खुला) और “स्पर्म” का अर्थ होता है बीज (seed)। ऐसे पौधे जिनके फल के अंदर बंद नहीं रहते है।

(ii) ये पौधे आमतौर पर बहुवर्षीय (कई साल तक जीवित), सदैव हरे और लकड़ीदार होते हैं।

(iii) इनमें जड़, तना और पत्तियाँ अच्छी तरह से विकसित होती हैं। और इनके अंदर संवहन ऊतक (जाइलम और फ्लोएम) मौजूद रहते हैं।

(iv) इनका मुख्य उदाहरण साइकस एवं पाइनस के पौधे हैं। और पाइन सदैव हरा पेड़ होता है, जो ठंडी पहाड़ी जगहों पर पाया जाता है।

(v) साइकस पौधा ताड़ जैसा दिखता है। और यह मरुद्भिदी (सूखी जगहों पर भी रह सकता है) पौधा है। इसका तना लंबा, मोटा और बिना शाखाओं वाला होता है।

एंजियोस्पर्म 

(i) “एंजियो” का अर्थ होता है ढका हुआ (covered) और “स्पर्म” का अर्थ है बीज (seed)। ऐसे पौधे जिनके फल के अंदर बंद रहते है।

(ii) यह पादप जगत का सबसे बड़ा समूह है। यानी धरती पर सबसे ज़्यादा यही पौधे पाए जाते हैं।

(iii) इनका अंडाशय (Ovary) फल में बदल जाता है, और बीज अंडाशय के अंदर बनता है।

(iv) मनुष्य की अधिकांश ज़रूरतें (जैसे अनाज, दालें, तेल, फल, सब्जियाँ, लकड़ी आदि) सभी एंजियोस्पर्म पौधों से पूरी होती हैं।

(v) इनमें भोजन जमा या तो भ्रूणपोष में या बीजपत्रों में होता है। भ्रूणपोष बीज के अंदर का एक हिस्सा होता है। उदाहरण: धान, गेहूँ, मक्का आदि (इनमें भोजन भ्रूणपोष में होता है)। बीजपत्रों बीज के अंदर पत्तीनुमा भाग होते हैं। उदाहरण: मटर, चना, राजमा आदि (इनमें भोजन बीजपत्रों में होता है)।

(vi) बीजों में बीजपत्र की संख्या के आधार पर एंजियोस्पर्म को दो भागों में बाँटा गया है – (i) एकबीजपत्री या मोनोकॉटिलीडन्स तथा (ii) द्विबीजपत्री या डाइकॉटिलीडन्स

(vii) एकबीजपत्री के बीजों में सिर्फ एक बीजपत्र होता है। इनकी पत्तियों में शिराएँ समानांतर (parallel) होती हैं। इनका जड़ तंत्र रेशेदार होता है। संवहन बंडल पूरे तने में फैले रहते हैं। उदाहरण: धान, गेहूँ, मक्का, ईख, घास

(viii) द्विबीजपत्री के बीजों में दो बीजपत्र होता है। पत्तियों में जालदार शिराविन्यास होता है। संवहन बंडल तने में वलय (ring) के रूप में होते हैं। इनका जड़ तंत्र अधिमूल (एक मुख्य जड़ होती है जिसकी शाखाएँ फैलती हैं) होता है। उदाहरण: आम, लीची, बरगद, गुलाब

एनिमेलिया (जंतु जगत)

☛ जंतु जगत की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

(i) ये बहुकोशिकीय तथा यूकैरियोटी होते हैं।

(ii) ये जंतु परपोषी या विषमपोषी होते हैं। और जानवरों में क्लोरोफिल नहीं होता है, इसलिए ये अपना भोजन खुद नहीं बना सकते हैं। ये अपना भोजन ग्लाइकोजन के रूप में जमा करते हैं।

(iii) इनका शरीर द्विस्तरीय (डिप्लो ब्लास्टिक) अथवा त्रिस्तरीय (ट्रिप्लो ब्लास्टिक) होता है।
जब किसी जंतु का शरीर दो जनन-स्तर एक्टोडर्म (इससे शरीर की बाहरी त्वचा और तंत्रिका तंत्र बनते हैं) तथा एंडोडर्म (इससे शरीर के आंतरिक अंग बनते हैं) का बना होता है, तब उसे द्विस्तरीय जंतु कहते हैं। उदाहरण: हाइड्रा, जेलीफिश आदि।

वैसे जंतु जिनके शरीर में इन दोनों जनन-स्तरों के अलावा तीसरा स्तर मेसोडर्म (इससे शरीर के बीच में मांसपेशियाँ, हड्डियाँ, रक्त आदि बनते हैं) भी होता है, उन्हें त्रिस्तरीय (ट्रिप्लो ब्लास्टिक) कहते हैं। उदाहरण: मेढक, कीड़े, मनुष्य आदि।

(iv) ये चलायमान होते हैं — यानी अधिकांश जानवर चल-फिर सकते हैं।

(v) इनके शरीर का आकार निम्न प्रकार का होता है —

👉 द्विपार्श्व सममित (Bilateral Symmetry) — ऐसे जंतु जिनके शरीर को बीच से दो समान भागों में बाँटा जाए, तो दोनों हिस्से एक-दूसरे के आईने जैसे लगते हैं। उदाहरण: मेढ़क, मछली, मनुष्य

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👉 अरीय सममित (Radial Symmetry) — ऐसे जंतु जिनके शरीर को किसी भी दिशा में केंद्र से रेखा खींची जाए तो हर हिस्सा समान होता है। उदाहरण: हाइड्रा, स्टारफिश, जेलीफिश

👉 असममित (Asymmetrical) — ऐसे जंतु जिनके शरीर को किसी भी दिशा से समान भागों में नहीं बाँटा जा सकता है। उदाहरण: स्पंज, घोंघा (Snail)

(vi) शरीर की दीवार और आहारनाल के बीच जो जगह होती है, उसे देहगुहा (Body cavity) कहते हैं। यदि इस जगह के चारों ओर मेसोडर्म की परत होती है, तो इसे सीलोम कहते हैं।

(vii) कुछ जानवरों में बाह्यकंकाल (जैसे झींगा) या अंतःकंकाल (जैसे मनुष्य) होता है, जबकि कुछ में कंकाल नहीं होता (जैसे केंचुआ) है।

(viii) उपांग का अर्थ है — शरीर से निकले हुए हिस्से, जो किसी कार्य के लिए उपयोग होते हैं, जैसे पैर, हाथ, पंख आदि। यह उपांग शरीर से संधित (Jointed) अथवा असंधित (Unjointed) हो सकते हैं।

(ix) कुछ जंतुओं में नोटोकॉर्ड (रीढ़ की हड्डी) और आहारनाल पाई जाती है, जबकि कुछ में नहीं होती है।

(x) उच्च श्रेणी के जंतुओं में तंत्रिका तंत्र (Nervous system) पाया जाता है, जिससे वे महसूस कर सकते हैं, और पेशीतंत्र (Muscular system) होता है, जिससे वे शरीर को हिला-डुला या चला सकते हैं।

जंतु जगत का वर्गीकरण

संघ 1. पॉरिफेरा

(i) ये बहुकोशिकीय जंतु हैं, और ज़्यादातर समुद्र में पाए जाते हैं। इन्हें स्पंज कहा जाता है। ये कहीं चिपके रहते हैं (स्थिर होते हैं)।

(ii) इनके शरीर में बहुत छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, जिन्हें ऑस्टिया कहते हैं। इन छिद्रों से जल शरीर के अंदर जाता है और फिर ऑसकुलम नाम के बड़े छिद्र से बाहर निकलता है।

(iii) इनमें ऊतक नहीं पाए जाते हैं। शरीर के बाहर कठोर कंकाल होता है, जिसमें काँटे जैसे ढाँचे बने होते हैं, जिन्हें स्पिकूल्स कहते हैं। ये कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO₃) या सिलिका के बने होते हैं।

(iv) इनमें प्रजनन दो तरीकों से होता है:
👉 अलैंगिकमुकुलन या जेम्यूल द्वारा।
👉 लैंगिकशुक्राणु और अंडाणु के मेल से।

(v) ये द्विलिंगी होते हैं, यानी एक ही शरीर में नर और मादा दोनों अंग होते हैं।

(vi) इनमें पुनरुद्भवन की क्षमता होती है — शरीर का टूटा हुआ हिस्सा दोबारा बन सकता है।

(vii) उदाहरण: साइकन, हायलोनेमा, यूप्लेक्टेला, स्पंजिला (मीठे पानी में पाए जाते हैं)।

संघ 2. सीलेंटेरेटा या नाइडेरिया

(i) ये जलीय जीव हैं, अधिकतर समुद्र में पाए जाते हैं। कुछ अकेले और कुछ झुंड में रहते हैं।

(ii) ये द्विस्तरीय होते हैं। इनके शरीर का बाहरी स्तर एक्टोडर्म तथा भीतरी स्तर एण्डोडर्म (गैस्ट्रोडर्मिस) होता है। दोनों स्तरों के बीच में मेसोग्लीया होता है।

(iii) शरीर में एक बड़ी गुहा होती है, जिसे सीलेन्ट्रॉन (जठरगुहावाहिनी) कहते हैं। शरीर के ऊपर एक मुँह जैसा भाग होता है, जिसे हाइपोस्टोम कहते हैं।

(iv) मुँह के चारों ओर स्पर्शक होते हैं, जिनसे ये भोजन पकड़ते हैं। मुँह से ही भोजन अंदर भी जाता है और बाहर भी निकलता है।

(v) शरीर की दीवार में नाइडोब्लास्ट या नेमाटोसिस्ट नाम की डंक वाली कोशिकाएँ होती हैं, जो शिकार पकड़ने, रक्षा करने और सतह से चिपकने में मदद करती हैं।

(vi) इनमें प्रजनन दो प्रकार का होता है —
👉 अलैंगिक — मुकुलन द्वारा।
👉 लैंगिक — अंडाणु और शुक्राणु के मेल से।

(vii) उदाहरण: हाइड्रा, ऑरीलिया (जेलीफ़िश), समुद्री ऐनीमोन, कोरल आदि।

संघ 3. प्लेटीहेल्मिन्थीज़

(i) ये त्रिस्तरीय होते हैं — शरीर में तीन परतें होती हैं। शरीर द्विपार्श्व सममित होता है।

(ii) ये अधिकतर परजीवी होते हैं — दूसरे जीवों के शरीर में रहकर भोजन लेते हैं। कुछ स्वतंत्रजीवी होते हैं, जैसे प्लेनेरिया

(iii) इनके शरीर में देहगुहा नहीं होती है, इसलिए इन्हें एसीलोमेट कहते हैं। इनका शरीर पीठ से पेट की दिशा में चपटा होता है।

(iv) आहारनाल केवल एक छेद (मुँह) से खुलता है। यानी भोजन अंदर भी वहीं से जाता है और बाहर भी वहीं से निकलता है। कुछ में जैसे टीनिया में आहारनाल नहीं होता है।

(v) इनमें श्वसन, रक्त परिवहन और कंकाल तंत्र नहीं होते हैं। ये उभयलिंगी होते हैं, यानी एक ही शरीर में नर और मादा दोनों अंग पाए जाते हैं।

(vi) उदाहरण: प्लेनेरिया, टीनिया, सिस्टोसोमा, यकृत पर्णाभ। इनमें प्लेनेरिया स्वतंत्रजीवी तथा अन्य परजीवी हैं।

संघ 4. एस्केल्मिन्थीज

(i) इनका शरीर लंबा, बेलनाकार और खंडों में बँटा नहीं होता है। इन्हें गोलकृमि भी कहा जाता है।

(ii) शरीर में द्विपार्श्व सममिति होती है — यानी शरीर को दो समान भागों में बाँटा जा सकता है।

(iii) इनमें मिथ्या देहगुहा (पूरी तरह से असली नहीं) होती है, जिसे कूटसीलोम कहते हैं।

(iv) इनमें पाचन तंत्र, मुखद्वार और गुदा होते हैं। लेकिन श्वसन तंत्र और रक्त परिसंचरण तंत्र नहीं होते हैं।

(v) ये एकलिंगी होते हैं, यानी नर और मादा अलग-अलग शरीर में पाए जाते हैं। ये अधिकतर परजीवी होते हैं तथा मनुष्य व जानवरों में रोग फैलाते हैं। उदाहरण: ऐस्केरिस, हुकवर्म, पिनवर्म

संघ 5. एनीलिडा

(i) इनका शरीर खंडों में बँटा होता है, और हर खंड एक जैसा दिखाई देता है। ये द्विपार्श्व सममित और ट्रिप्लोब्लास्टिक (तीन परतों से बने) होते हैं।

(ii) ये स्थल एवं जल दोनों जगहों में पाए जाते हैं। स्थलीय एनीलिड नम मिट्टी में रहते हैं। जलीय एनीलिड मीठे और खारे पानी दोनों में पाए जाते हैं।

(iii) इनमें वास्तविक देहगुहा (True Coelom) होती है।

(iv) इनके पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र, रक्त परिसंचरण तंत्र, उत्सर्जन तंत्र तथा तंत्रिका तंत्र अच्छे से विकसित होते हैं।

(v) ये एकलिंगी या उभयलिंगी दोनों हो सकते हैं।
उदाहरण: नेरीस, समुद्री चूहा, केंचुआ, जोंक आदि।

 

संघ 6. आर्थोपोडा

(i) यह सबसे बड़ा संघ है। सारे ज्ञात जानवरों में लगभग 75% इसी संघ के होते हैं। ये जल, स्थल और वायु – हर जगह पाए जाते हैं। स्वतंत्रजीवी या परजीवी दोनों हो सकते हैं।

(ii) इनका शरीर खंडित, द्विपार्श्व सममित और ट्रिप्लोब्लास्टिक होता है। इनमें संधित उपांग पाए जाते हैं। शरीर पर कठोर बाह्यकंकाल होता है, जो क्यूटिकल नामक पदार्थ से बना होता है।

(iii) इनके शरीर में रक्त से भरी देहगुहा होती है जिसे हीमोसील कहते हैं। इसमें आहारनाल विकसित होता है और मुख के पास मुखांग (mouth parts) होते हैं।

(iv) इनमें श्वसन गलफड़ों, ट्रेकिया या बुक लंग्स से होता है। इनका रक्त परिसंचरण तंत्र खुला प्रकार का होता है, यानी रक्त नलिकाओं में न बहकर सीधे शरीर की गुहा (हीमोसील) में बहता है।

(v) उत्सर्जन के लिए इनमें मैलपीगियन नलिकाएँ होती हैं। और ये एकलिंगी जीव होते हैं, यानी नर और मादा अलग-अलग होते हैं।

(vi) इनके जीवन-चक्र में कायांतरण होता है। जब किसी जीव के अंडे से वयस्क बनने तक उसके शरीर का आकार या रूप पूरी तरह बदल जाता है, तो इसे कायांतरण कहते हैं। जैसे: अंडा → लार्वा → प्यूपा → वयस्क

(vii) इसका उदाहरण — झींगा , केंकड़ा, तिलचट्टा, मच्छर, मक्खी, तितली, बिच्छू

🐚 संघ 7. मोलस्का

(i) इनका शरीर अखंडित और द्विपार्श्व सममित होता है, लेकिन टॉर्शन नाम की एक प्रक्रिया के कारण कुछ जीवों का शरीर असमान हो जाता है, जैसे — घोंघा (snail)

(ii) शरीर के ऊपर एक कोमल झिल्ली होती है, जिसे प्रावार या मेंटल कहते हैं। अधिकांश मोलस्का के शरीर के ऊपर कैल्सियम कार्बोनेट का कठोर कवच होता है।

(iii) इनका हृदय शरीर के पीछे की ओर एक थैली के अंदर होता है। इनका रक्त परिसंचरण तंत्र खुला होता है — यानी रक्त नलियों में बंद नहीं रहता, बल्कि शरीर में खुला बहता है।

(iv) इसमें श्वसन गलफड़ों (gills) या फेफड़े से होता है। और इनकी देहगुहा छोटी होती है।

(v) इनके पास एक पेशीय पाँव (muscular foot) होता है, जिससे ये रेंगते या चलते हैं। ये ज़्यादातर एकलिंगी होते हैं, यानी नर और मादा अलग-अलग होते हैं, लेकिन कुछ द्विलिंगी भी होते हैं।

(vi) इसका उदाहरण – काइटन, घोंघा, सीप, ऑक्टोपस, सीपिया

🌊 संघ 8. इकाइनोडर्मेटा

(i) इस संघ के सभी जीव समुद्री होते हैं। भ्रूण अवस्था में ये द्विपार्श्व सममित होते हैं, लेकिन बड़े होने पर इनका शरीर गोल हो जाता है।

(ii) इनकी त्वचा के नीचे कैल्शियम की कठोर प्लेटें होती हैं। और त्वचा के ऊपर काँटे निकले रहते हैं, इसलिए इन्हें “इकाइनोडर्म” कहा जाता है। जिसका मतलब है “काँटेदार त्वचा वाले जीव।”

(iii) इनके शरीर में जल परिवहन तंत्र (जलसंवहन नाल तंत्र) होता है, जो इन्हें चलने और साँस लेने में मदद करता है। और ये एकलिंगी होते हैं।

(iv) इसका उदाहरण – तारा मछली, समुद्री खीरा, सी अर्चिन, ब्रिटल स्टार, एंटीडॉन

संघ 9. प्रोटोकॉर्डेटा

(i) इस समूह के जीवों में नोटोकॉर्ड पाया जाता है। जो एक लचीली छड़ी जैसी रचना होती है, जो शरीर के पीछे की ओर (पृष्ठीय भाग) होती है। नोटोकॉर्ड जीवन के किसी एक समय या पूरे जीवनभर शरीर में मौजूद रह सकती है।

(ii) इस संघ में एक उपसंघ हेमीकॉर्डेटा होता है। हेमीकॉर्डेटा में नोटोकॉर्ड नहीं होता है, लेकिन तंत्रिका रज्जु (nerve cord) होता है, जो शरीर के अग्रभाग तक ही रहता है।

(iii) पहले वैज्ञानिकों का मानना था कि हेमीकॉर्डेटा के जीव कॉर्डेटा (रीढ़ वाले जीवों) के जैसे हैं, इसलिए इन्हें इसी समूह में रखा गया था, लेकिन अब इसे अलग संघ माना गया है।

(iv) ये जीव द्विपार्श्व सममित और ट्रिप्लोब्लास्टिक (तीन परतों वाले) होते हैं। और इनकी वास्तविक देहगुहा होती है।

(v) इनके मुँह के पीछे वाले भाग (ग्रसनी) में दो-दो गिल छिद्र होते हैं, और इन्हीं छिद्रों से ये साँस लेते हैं।

(vi) इसका उदाहरण – बैलैनोग्लोसस (एकॉर्न वर्म), हर्डमैनिया , एम्फीऑक्सस (ब्रैंकियोस्टोमा)

संघ 10. कॉर्डेटा

(i) ये जल और स्थल दोनों में पाए जाते हैं। और ये ट्रिप्लोब्लास्टिक (तीन परतों वाले) तथा सीलोमेट (वास्तविक देहगुहा वाले) जीव हैं।

(ii) इनमें नोटोकॉर्ड (रीढ़) जैसी पृष्ठरज्जु होती है, जो बाद में अस्थि या उपास्थि से बनी रीढ़ की हड्डी में बदल जाती है।

(iii) इनमें ग्रसनी गिल छिद्र होते हैं — यानी गले के हिस्से में छोटे-छोटे छेद, जो साँस लेने में काम आते हैं। और कुछ जीवों में ये केवल भ्रूण अवस्था में ही पाए जाते हैं।

(iv) इनका रक्त परिसंचरण तंत्र बंद होता है — यानी रक्त हमेशा रक्तनलिकाओं में ही बहता है। इनका हृदय शरीर के नीचे वाले हिस्से (पेट) में होता है। और इनके शरीर में पूँछ गुदा के पीछे होती है।

(v) इसका उदाहरण – मछली, मेंढक, पक्षी, मनुष्य आदि।

उपसंघ – वर्टिब्रेटा

(i) इस उपसंघ के सभी जीवों में नोटोकॉर्ड की जगह पर अस्थियों / उपास्थियों से बना मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी) होता है।

(ii) इनका मस्तिष्क बहुत विकसित होता है और यह खोपड़ी (क्रेनियम) नामक हड्डीदार डिब्बे में बंद रहता है, इसलिए इन्हें क्रेनियेटा भी कहा जाता है।

(iii) इनके सिर में संवेदी अंग (sense organs) होते हैं — जैसे आँखें (देखने के लिए), कान (सुनने के लिए), नाक (सूँघने के लिए) आदि।

(iv) वर्टिब्रेटा को 5 मुख्य वर्गों में बाँटा गया है।

वर्ग 1. मत्स्य या पीसीज

(i) इस वर्ग में सभी मछलियाँ आती हैं। और ये लवणीय तथा मीठे पानी (freshwater) दोनों जगह पाई जाती हैं।

(ii) इनका शरीर धारारेखीय होता है — यानी तैरने के लिए आगे से पतला और पीछे चौड़ा, जिससे पानी का अवरोध (resistance) कम होता है।

(iii) इनकी त्वचा पर छोटे-छोटे कड़े छिलके जैसे शल्क होते हैं, और ये अपने पंखों और मजबूत पूँछ की मदद से तैरते हैं।

(iv) इसका अंतः कंकाल, उपास्थि (जैसे स्कोलिओडोन, इलेक्ट्रिक रे) या अस्थि (जैसे रोहू, कतला, ट्यूना आदि) के बने होते हैं।

(v) इसमें श्वसन गिल्स से होता है — गिल्स पानी में घुली ऑक्सीजन को ग्रहण करते हैं। और इनके हृदय में दो कक्ष (chambers) होते हैं।

(vi) ये शीतरक्तीय (cold-blooded) होते हैं — यानी वातावरण के तापमान के अनुसार इनका शरीर का तापमान बदलता है। और ये अंडे पानी में देते हैं।

(vii) इसका उदाहरण – स्कोलिओडोन, इलेक्ट्रिक रे, रोहू, समुद्री घोड़ा आदि।

वर्ग 2. एम्फिबिया

(i) इस वर्ग के जीव जल और स्थल दोनों जगह रह सकते हैं, इसलिए इन्हें उभयचर कहा जाता है।

(ii) ये शीतरक्तीय होते हैं, यानी इनका शरीर का तापमान मौसम के तापमान के साथ बदलता रहता है।

(iii) इनकी त्वचा मुलायम होती है। त्वचा में छोटी-छोटी ग्रंथियाँ होती हैं, जो त्वचा को गीला रखती हैं। और इनकी त्वचा पर शल्क नहीं होते है।

(iv) श्वसन तीन तरीकों से होता है — त्वचा, गिल्स और फेफड़ों के द्वारा। और अंतः कंकाल, अस्थि का बना होता है।

(v) हृदय में तीन कक्ष होते हैं — दो अलिंद और एक निलय। और लाल रक्त कणिकाएँ (RBC) केंद्रकयुक्त होती हैं।

(vi) मल (waste) और मूत्र (urine) दोनों एक ही छेद से बाहर आते हैं, जिसे क्लोएका कहते हैं। इनका निषेचन शरीर के बाहर होता है, यानी नर और मादा अंडे-पानी में मिलाते हैं।

(vii) बच्चे लार्वा अवस्था में निकलते हैं और बाद में कायांतरण के द्वारा वयस्क बनते हैं। इसका उदाहरण– मेंढक , टोड, दादुर आदि।

वर्ग 3. रेप्टीलिया

(i) ये मुख्य रूप से स्थल पर रहने वाले होते हैं, लेकिन कुछ जल में भी पाए जाते हैं। और यह रेंगकर चलते हैं, इसलिए इन्हें सरीसृप कहा जाता है।

(ii) ये शीतरक्तीय होते हैं। त्वचा पर शुष्क, कड़े शल्क होते हैं। और त्वचा पर कोई ग्रंथियाँ नहीं होतीं है, इसलिए यह सूखी रहती है।

(iii) श्वसन केवल फेफड़ों के द्वारा होता है। इसके हृदय में तीन कक्ष होते हैं, लेकिन मगरमच्छ में चार कक्ष होते हैं। और अंतः कंकाल, अस्थि का बना होता है।

(iv) इसमें निषेचन अंदर होता है। और ये अंडे स्थल पर देते हैं, जल में नहीं। और इनका कोई लार्वा चरण नहीं होता है यानी बच्चे सीधे वयस्क जैसे जन्म लेते हैं।

(v) इसका उदाहरण – कछुआ, छिपकली, अजगर, कोबरा आदि।

वर्ग 4. एवीज

(i) इस वर्ग में सभी पक्षी आते हैं। और ये नियततापी होते हैं — यानी इनका शरीर का तापमान मौसम बदलने पर भी एक जैसा रहता है।

(ii) ये उड़ने वाले जीव होते हैं। और इनके शरीर पर पंख (पर) होते हैं, जो उड़ने में मदद करते हैं। और इनके जबड़ों में दाँत नहीं होते है। तथा यह फेफड़ों (lungs) से साँस लेते हैं।

(iii) इनका हृदय चार भागों में बँटा होता है — दो अलिंद (auricles) और दो निलय (ventricles)

(iv) इनका कंकाल, हल्का और खोखला होता है, ताकि उड़ने में आसानी हो। और ये अंडे देने वाले जीव होते हैं, इनके अंडे कठोर खोल से ढके होते हैं।

(v) इसका उदाहरण – कबूतर, गौरैया, मयना, मोर, तोता आदि।

वर्ग 5. स्तनी या मैमेलिया

(i) इस वर्ग में सभी स्तनधारी जीव आते हैं। और ये भी नियततापी होते हैं — यानी इनका शरीर का तापमान हमेशा एक समान रहता है।

(ii) इनकी त्वचा पर बाल होते हैं। और इनके कानों में बाहरी हिस्सा होता है, जो आवाज़ सुनने में मदद करता है।

(iii) मादा स्तनधारियों में स्तन ग्रंथियाँ होती हैं, जो दूध बनाती हैं ताकि बच्चे को पिलाया जा सके।

(iv) ये फेफड़ों से साँस लेते हैं। और इनका हृदय चार भागों में बँटा होता है। इनका निषेचन शरीर के अंदर होता है।

(v) ज्यादातर मादा जीव बच्चे को जन्म देती हैं, अंडे नहीं देतीं है। लेकिन कुछ अपवाद हैं —

👉 बतखचोंचा और इकिडना — ये अंडे देने वाले स्तनधारी हैं।
👉 कंगारू — ये अविकसित बच्चे को जन्म देता है। और बच्चा माँ के पेट के नीचे बनी मार्सूपियम थैली में रहता है और वहीं दूध पीकर बड़ा होता है।

(vi) इसका उदाहरण – चमगादड़, गिलहरी, चूहा, कुत्ता, बंदर, शेर, हाथी, मनुष्य

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दोस्तों उम्मीद करता हूं कि ऊपर दिए गए कक्षा 9वीं के जीव विज्ञान के पाठ 03 जीवों में विविधता (jivo me vividhta) का नोट्स और उसका प्रश्न को पढ़कर आपको कैसा लगा, कॉमेंट करके जरूर बताएं। धन्यवाद !

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