Bihar Board Class 9th chapter 2 अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम | Ameriki swatantrata sangram class 9th History Notes & Solution
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Bihar Board Ncert Class 10th Social science History ch 3 हिंद-चीन (इंडो-चाइना) में राष्ट्रवादी आंदोलन । Hind Chin me Rashtrawadi Andolan notes & Objective

आज के इस पोस्ट में हमलोग कक्षा 10वीं इतिहास का पाठ ‘हिंद-चीन (इंडो-चाइना) में राष्ट्रवादी आंदोलन’ का नोट्स को देखने वाले है। Hind Chin me Rashtrawadi Andolan

Bihar Board Ncert Class 10th Social science History ch 3 हिंद-चीन (इंडो-चाइना) में राष्ट्रवादी आंदोलन । Hind Chin me Rashtrawadi Andolan notes & Objective

हिंद-चीन में राष्ट्रवादी आंदोलन

(i) हिंद-चीन, दक्षिण पूर्व एशिया में स्थित है। इसका क्षेत्रफल लगभग 3 लाख (2.80 लाख) वर्ग किलोमीटर है। वर्तमान में हिंद-चीन में वियतनाम, लाओस और कंबोडिया के क्षेत्र आते हैं।

(ii) हिंद चीन के उत्तर में म्यांमार और चीन है, दक्षिण में चीन सागर और पश्चिम में म्यांमार के क्षेत्र आते हैं।

(iii) हिंद-चीन के कुछ क्षेत्रों पर हिंदुस्तान और कुछ क्षेत्रों पर चीन के सांस्कृतिक का प्रभाव था, इसीलिए इसे हिंद-चीन के नाम से जाना जाता था।

(iv) वियतनाम के तोंकिन एवं अन्नाम क्षेत्र पर चीन का प्रभाव था। तथा लाओस और कंबोडिया (कंबूज, कंपुचिया) के क्षेत्र पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव था।

(v) चौथी शताब्दी में भारतवंशीय राजा ने कंबूज राज्य की स्थापना की थी। और यह भारतीय संस्कृति का प्रमुख केंद्र था। 12 वीं शताब्दी में राजा सूर्य वर्मा द्वितीय ने कंबोडिया में अंकोरवाट का मंदिर (विष्णु मंदिर) का निर्माण करवाया था। परन्तु 16 वीं शताब्दी में कंबूज का पतन हो गया।

प्रश्न 1. तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व तोंकिन पर किसने अधिकार किया?
उत्तर: चीन के चिन वंश के सम्राट शी-हुआंग-टी ने।

प्रश्न 2. तोंकिन और अन्नाम पर शी-हुआंग-टी के बाद किसने अधिकार किया?
उत्तर: हान वंश के राजा वू-ती ने।

प्रश्न 3. वियतनाम पर 15वीं शताब्दी में दोबारा किसने कब्ज़ा किया?
उत्तर: चीन के मिंग वंश के सम्राट युंग-ली ने।

प्रश्न 4. 19वीं शताब्दी में वियतनाम पर किस चीनी राजवंश का प्रभुत्व स्थापित हुआ?
उत्तर: मंचू राजवंश का।

हिंद चीन में व्यापारिक कंपनियों का आगमन

सर्वप्रथम पुर्तगाली व्यापारियों ने 1510 में मलक्का को व्यापारिक केंद्र बनाकर हिंद चीनी देशों के साथ व्यापार शुरू किया। और पुर्तगाली के बाद हिंद-चीन में डच (हॉलैंड या नीदरलैंड), इंग्लैंड और फ्रांस आए।

फ्रांस द्वारा हिंद चीन में उपनिवेश की स्थापना

(i) 1747 के बाद फ्रांस अन्नाम में रुचि लेने लगा। 1862 में अन्नाम को सैन्य बल पर संधि के लिए बाध्य किया और 1884 में अन्नाम अधिकार कर लिया।

(ii) 1787 में कोचीन चीन के शासक के साथ फ्रांस ने संधि किया। तथा 1862 में कोचीन चीन पर फ्रांस ने अधिकार कर लिया।

(iii) 1783 में तोंकिन में फ्रांसीसी सेना का प्रवेश हुआ।

(iv) फ्रांस ने 1863 में कंबोडिया को अपने संरक्षण में ले लिया। और 1904 में लाओस पर कब्जा कर लिया।

(v) 20वीं शताब्दी के आरंभ में संपूर्ण हिंद-चीन पर फ्रांस ने कब्जा कर लिया। और हिंद-चीन में बसने वाले फ्रांसीसी को कोलोन कहा जाता था।

(vi) 1884–1887 के आसपास फ्रांस ने अन्नाम, तोकिन, कोचीन-चीन, कंबोडिया और बाद में लाओस को मिलाकर French Indochina (फ्रेंच इंडो-चाइना) की स्थापना की।

हिंद-चीन पर फ्रांस द्वारा उपनिवेश स्थापना का उद्देश्य

(i) फ्रांस ने हिंद-चीन को उपनिवेश इसलिए बनाया ताकि डच और ब्रिटिश कंपनियों की व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का मुकाबला कर सके।

(ii) फ्रांस को उपनिवेश से कच्चा माल की आपूर्ति होती थी एवं उत्पादित वस्तुओं के लिए बाजार भी उपलब्ध होता था।

(iii) यूरोपीय देश अपने आपको “सभ्य” मानते थे और वे मानते थे कि पिछड़े समाज को आगे बढ़ाना और सभ्य बनाना उनका कर्तव्य है।

हिंद चीन में फ्रांस द्वारा किए गए कार्य

(i) फ्रांस ने हिंद-चीन के नगरों, बंदरगाहों, किसानों, मजदूरों तथा संसाधनों का भरपूर शोषण किया।

(ii) फ्रांसीसियों ने शोषण के साथ कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए नहरें और जल निकासी का प्रबंध किया गया, दलदली भूमि और जंगल को खेती लायक बनाया गया। जिसके कारण 1931 तक वियतनाम विश्व का तीसरा सबसे बड़ा चावल निर्यात वाला देश बन गया।

(iii) फ्रांसीसियों ने उत्तर से दक्षिण हिंद चीन तक विशाल रेल नेटवर्क एवं सड़क का जाल बिछवाया। 1910 तक मुख्य रेललाइनें तैयार हो गईं।

(iv) फ्रांसीसियों का लक्ष्य था वियतनामी को यूरोपीय आधुनिक सभ्यता से परिचित कराना (civilizing mission)। वे मानते थे कि पारंपरिक संस्कृतियाँ आधुनिकता की राह में बाधा हैं, इसलिए शिक्षा के जरिए नई सोच फैलानी चाहिए।

(v) इसलिए हिंद चीन के लोगों को फ्रांसीसी भाषा में शिक्षा देने लगे। फ्रांसीसियों को डर था कि शिक्षा से लोग जागरूक होंगे, इसीलिए स्कूल के अंतिम साल की परीक्षा में दो-तिहाई स्थानीय बच्चों को फेल कर दिया करता था। हनोई विश्वविद्यालय को बंद कर दिया गया।

(vi) 1925 में लगभग 1.7 करोड़ की जनसंख्या में, स्कूल शिक्षा पूरी करने वालों की छात्रों की संख्या 400 से कम थी।

(vii) हिंद-चीन के रबड़ बागानों, फार्मों, खानों में मजदूरों से एक तरफा अनुबंध व्यवस्था पर काम करवाया जाता था।

एक तरफा अनुबंध व्यवस्था – एकतरफा अनुबंध व्यवस्था एक तरह का बंधुआ मजदूरी थी। जिसमें मजदूरों को कोई अधिकार नहीं था, जबकि मालिक को असीमित अधिकार प्राप्त था।

(viii) पॉल बर्नार्ड का मानना था कि उपनिवेशों से अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए उनकी अर्थव्यवस्था का विकास करना आवश्यक है।

(ix) तोकिन के जीवन आधार लाल घाटी थी जबकि कम्बोडिया का मेकांग नदी का मैदानी क्षेत्र एवं कोचीन-चीन का मेकांग का डेल्टा क्षेत्रचीन से सटे राज्यों में कोयला, टीन, जस्ता, टंगस्टन तथा क्रोमियम आदि मिलते थे।

हिंद चीन में राष्ट्रीयता का विकास

(i) फान बोई चाऊ, वियतनामी परंपराओं के नष्ट होने से दुखी थे। इस लिए 1903 में फान बोई चाऊ ने Revolutionary Society (दुई तान होई) नामक एक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की, जिसके नेता न्यूयेन राजवंश के राजकुमार कुआंग दें थे।

(ii) फान बोई चाऊ पर चीन के समाज सुधारक लिआंग कियाओ का गहरा असर पड़ा। 1905 में उन्होंने लिआंग कियाओ से मुलाकात की। और उनकी सलाह पर फान बोई चाऊ ने “द हिस्ट्री ऑफ द लॉस ऑफ वियतनाम” पुस्तक लिखी।

(iii) इस पुस्तक में दो मुद्दे उठाए गए, पहला उपनिवेशवाद के कारण वियतनाम की संप्रभुता (स्वतंत्रता) समाप्त हो गई। दूसरा चीन और वियतनाम के अभिजात्य वर्ग को जोड़ने वाला संबंध तंत्र टूट गया।

(iv) फान-चू-त्रिन्ह ने राष्ट्रवादी आंदोलन को गणतंत्रवादी बनाने का प्रयास किया। और 1905 में जापान द्वारा रूस की हार ने वियतनामी राष्ट्रवादियों को प्रेरणा दिया। रूसो एवं मांटेस्क्यू जैसे फ्रांसीसी विचारकों के विचारों का प्रभाव

(v) सन यात-सेन के नेतृत्व में चीन में सत्ता परिवर्तन ने वियतनामी छात्रों को प्रेरित किया। और छात्रों ने “वियतनाम कुवान फुक होई” (वियतनाम मुक्ति एसोसिएशन) की स्थापना की। तथा 1914 में वियतनाम के देश भक्तों ने वियतनामी राष्ट्रवादी दल नामक संगठन बनाया।

(vi) 1917 में न्यूगन आई क्वोक (हो ची मिन्ह) नामक एक वियतनामी छात्र ने पेरिस में साम्यवादियों का एक गुट बनाया। और 1919 में चीनी-बहिष्कार आंदोलन हुआ। तथा 1925 में हो ची मिन्ह ने वियतनामी क्रांतिकारी दल का गठन किया।

(vii) 1930 में विभिन्न गुटों को मिलाकर वियतनाम कम्युनिस्ट पार्टी (वियतनाम कांग सान देंग) की स्थापना हुई। और जोन्गुएन आई ने अनामी दल की स्थापना की। और यह पार्टी मास्कोकैण्टन से प्रभावित थी।

द्वितीय विश्व युद्ध और वियतनामी स्वतंत्रता

(i) द्वितीय विश्व युद्ध के समय जून 1940 में फ्रांस, जर्मनी से हार गया। और फ्रांस में जर्मन समर्थित सरकार बनी। एक संधि के तहत जापान को हिन्द-चीन में सेना भेजने की अनुमति मिली। तब जापान ने तोंकिन, अन्नाम और फिर पूरे हिन्द-चीन पर राजनीतिक प्रभुत्व जमा लिया।

(ii) हो-ची-मिन्ह के नेतृत्व में “वियतनाम स्वतंत्रता लीग” (वियेतमिन्ह) की स्थापना हुई। जिसमें किसान, व्यापारी, बुद्धिजीवी सभी शामिल थे और वियेतमिन्ह ने छापामार युद्धनीति अपनाई।

(iii) द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान ने दिसंबर 1941 को अमेरिका के पर्ल हार्बर हवाई अड्डे पर आक्रमण कर दिया। और 1944 में फ्रांस जर्मनी के आधिपत्य से मुक्त हुआ। जिसके बाद अमेरिका ने 1945 में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हमला किया।

(iv) इस प्रकार फ्रांस और जापान द्वितीय विश्व युद्ध में फंस गया। तथा पोट्सडम घोषणा के बाद जापान ने आत्मसमर्पण किया। जापानी सेनाएँ वियतनाम से निकलने लगीं, तब इसका लाभ उठाते हुए हो ची मिन्ह ने लोकतंत्रीय गणराज्य की स्थापना 2 सितंबर 1945 ईस्वी को की। तथा नई सरकार का प्रमुख हो-ची-मिन्ह बने।

(v) जापानी सेना के निकलने पर हिन्द चीन के राज्यों में पुनः प्राचीन राजवंशी शासक बने। और अन्नाम का शासक बाओदाई बना। लेकिन साम्यवादी राष्ट्रवादियों के सामने राजवंश टिक नहीं सके। और 25 अगस्त 1945 को बाओदाई ने अपना पद छोड़ दिया। इस तरह 1945 में वियतनाम एक गणराज्य बन गया।

(vi) जापानी सेना हटते ही फ्रांसीसी फौज सैगॉन पहुँची, तो वियतनामी छापामारों से भीषण लड़ाई हुई; फ्रांसीसी सेना सैगॉन में फँस गई।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हिंद चीन के प्रति फ्रांसीसी नीति

(i) द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन, हॉलैंड, अमेरिका और फ्रांस दक्षिण-पूर्व एशिया में अपना साम्राज्य फिर से स्थापित करना चाहते थे। जिसके लिए फ्रांस ने फ्रांसीसी औपनिवेशिक योजना लाया।

(ii) जिसमें फ्रांस के विशाल साम्राज्य को एक यूनियन (French Union) में बदल दिया जाएगा जिसमें सभी अधीन उपनिवेश सम्मिलित होंगे।

(iii) हिन्द-चीन इस फ्रांसीसी महासंघ/यूनियन का स्वशासित अंग होगा। और हिंद चीन के संरक्षित राज्य एवं कोचीन चीन को मिलाकर एक संघ बनाया जाएगा। लेकिन हिंद चीन संघ के विदेश नीति एवं सैन्य पर फ्रांस का नियंत्रण रहेगा।

हनोई समझौता किसे कहते हैं?
उत्तर– 6 मार्च 1946 को फ्रांस एवं वियतनाम के बीच हनोई समझौता हुआ। फ्रांस ने वियतनाम को आज़ादी दी, लेकिन पूरा नियंत्रण अपने हाथ में रखा।

फ्रांस चाहता था कि संघ का अध्यक्ष उसके द्वारा नियुक्त हाई-कमिश्नर हो। वियतनामी नेतृत्व चाहता था कि संघ के सभी राज्य वास्तविक रूप से स्वतंत्र हों। तब फ्रांस ने कोचीन-चीन में एक अलग सरकार स्थापित कर लिया जिसके कारण हनोई समझौता टूट गया। और फ्रांस ने पेरिस से बाओदाई को बुलाकर वियतनाम का शासक बना दिया।

1949 में हो-ची-मिन्ह ने कहा कि वे चीन की जनवादी गणराज्य (PRC = People’s Republic of China) को अपना आदर्श मानते हैं। और वियतनाम अब पूरी तरह साम्यवादी विचारधारा पर चलेगा।

1950 में सोवियत संघ (रूस) और चीन ने हो-ची-मिन्ह की सरकार (DRV – डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ वियतनाम) को मान्यता दे दी और उन्हें सैनिकतकनीकी मदद देना शुरू कर दिया।

1950 में हिंद चीन का स्थिति जटिल हो गई क्योंकि उत्तरी वियतनाम में हो ची मिन्ह की सरकार थी और दक्षिणी वियतनाम में फ्रांस समर्थित बाओदाई की सरकार। और लाओस, कम्बोडिया में पुराने राजतंत्र थे जो फ्रांसीसी नियंत्रण में थे।

1954 में गुरिल्ला (वियत-मिन्ह) सेनाओं ने दिएन-बिएन-फू पर भीषण आक्रमण किया। और फ्रांस की करारी हार; लगभग 16,000 फ्रांसीसी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया।

होआ-होआ आंदोलन किसे कहते हैं?
उत्तर– होआ-होआ एक बौद्धिष्ट धार्मिक क्रांतिकारी आंदोलन था, जो 1939 में मेकोंग डेल्टा क्षेत्र से शुरू हुआ था। जिसके नेता हुइन्ह फू सो था। यह आंदोलन फ्रांसीसी शासन और बुरी प्रथाओं (जैसे शराबखोरी, लालच, बाल विवाह और अन्य अत्याचार) के खिलाफ था। इस आंदोलन के लोगों को फ्रांसीसी सरकार ने पागल घोषित कर जेल में डाल दिया। बाद में 1941 में कुछ फ्रांसीसी डॉक्टरों ने माना कि वह पागल नहीं हैं।

वियतनाम का एकीकरण

(i) मई 1954 में हिंद चीन की समस्या पर वार्ता हेतु जेनेवा में एक सम्मेलन बुलाया गया जिसे जेनेवा समझौता कहा जाता है। जेनेवा समझौता के तहत वियतनाम को दो हिस्सों में बांट दिया गया। हनोई नदी से उत्तर के क्षेत्र उत्तरी वियतनाम साम्यवादी (हो ची मिन्ह) को और हनोई नदी से दक्षिण के क्षेत्र दक्षिणी वियतनाम अमेरिका समर्थित सरकार को दे दिया गया।

(ii) जेनेवा समझौता में कहा गया कि यदि जनता चाहे तो 1956 तक चुनाव कराकर पूरे वियतनाम का एकीकरण कर सकता है।

(iii) 1960 में नेशनल लिबरेशन फ्रंट (NLF) एवं वियतकांग (राष्ट्रीय मुक्ति सेना) का गठन कर वियतनाम की जनता एकीकरण का मांग को लेकर हिंसात्मक आंदोलन शुरू कर दिया।

(iv) 1961 में दक्षिणी वियतनाम में गृह युद्ध के कारण आपातकाल का घोषणा की गई। अमेरिका ने 1961 में शांति को खतरा नाम से श्वेत पत्र जारी कर हो ची मिन्ह को इस गृह युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराया।

(v) 1962 में अमेरिका ने 4000 सैनिकों को दक्षिणी वियतनाम के मदद के लिए सौगॉन भेज दिया। और 1963 में सेना ने विद्रोह कर दिया न्यो-दिन्ह-दियम को मार दिया और सैनिक सरकार की स्थापना की।

(vi) 5 अगस्त 1964 को अमेरिका ने उत्तरी वियतनाम पर आक्रमण कर दिया।

(vii) अमेरिका ने वियतनाम पर खतरनाक हथियारों, टैंको, बम वर्षक विमानों, रासायनिक हथियार नापाम, ऑरेंज एजेंट एवं फास्फोरस बम का जमकर इस्तेमाल किया।

(viii) अमेरिका का युद्ध केवल उत्तर वियतनाम से नहीं, बल्कि वियतकांग और दक्षिण वियतनाम की जनता (जो वियतकांग समर्थक थी) से भी था।

(ix) दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल ने अदालत लगाकर अमेरिका को युद्ध अपराधी ठहराया।

(x) 1968 में वियतकांग ने अमेरिकी शक्ति का प्रतीक पूर्वी पेंटागन पर धावा बोल दिया।

हो-ची-मिन्ह मार्ग = हो-ची-मिन्ह मार्ग हनोई से लाओसकंबोडिया के मार्ग से होकर दक्षिण वियतनाम तक जाता था। इस मार्ग से रसद की कई सहायक सड़कें जुड़ी थीं। अमेरिका ने बार-बार मार्ग को बमबारी कर क्षतिग्रस्त किया, पर वियतकांग तुरन्त मरम्मत कर लेते थे। अमेरिका ने नियंत्रण के लिए लाओस और कंबोडिया पर भी आक्रमण किए, पर तीन-तरफा संघर्ष में फँसकर उसे वापस जाना पड़ा।

(xi) अमेरिका शांति वार्ता चाहता था, पर अपनी शर्तों पर। 1968 में पेरिस में शांति वार्ता शुरू हुई; मगर अमेरिकी जिद के कारण असफल हो गई। वियतनामी मांग — पहले बमबारी बंद हो, फिर अमेरिकी सेनाएँ हटें।

(xii) 7 जून 1969 को वियतनामीयों ने दक्षिणी वियतनाम के मुक्त क्षेत्र में वियतकांग के सरकार की गठन की घोषणा कर दी। और इसी दौर में 2 सितंबर 1969 को हो-ची-मिन्ह की मृत्यु हुई।

(xiii) दक्षिणी वियतनाम में माई ली गांव की घटना के कारण अमेरिकी सेना का आलोचना(बुराई) पूरे विश्व में होने लगी।

अमेरिका के नए राष्ट्रपति निक्सन ने शांति के लिए पांच सूत्री योजना की घोषणा की

(i) हिन्द-चीन की सभी सेनाएँ युद्ध बन्द करें और अपने-स्थान पर रुकें

(ii) युद्ध-विराम की निगरानी अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों द्वारा की जाए।

(iii) युद्ध-विराम के दौरान कोई भी पक्ष अपनी शक्ति बढ़ाने का प्रयास न करे।

(iv) युद्ध-विराम के समय सभी प्रकार की लड़ाईयाँ बंद रहें।

(v) युद्ध विराम का अंतिम लक्ष्य समूच हिंद चीन में संघर्ष का अंत होगा।

युद्ध विराम की अमेरिकी शर्त

(i) दक्षिणी वियतनाम की स्वतंत्रता
(ii) अमेरिकी सेनाएं उस क्षेत्र में ही रहेगी

(iii) जब तक वियतकांग संघर्ष करेगा एवं दक्षिणी वियतनाम में आतंक मचाएगा बमबारी जारी रहेगी।

नोट :- 27 फरवरी 1973 को पेरिस में वियतनाम युद्ध के समाप्ति के समझौते पर हस्ताक्षर हो गया।

समझौते के मुख्य बातें

(i) युद्ध समाप्ति के 60 दिन के अंदर अमरीकी सेना वापस हो जायेगी।

(ii) उत्तर और दक्षिण वियतनाम परस्पर सलाह कर एकीकरण का मार्ग खोजेंगे।

(iii) अमेरिका, वियतनाम का एकीकरण के लिए असीमित आर्थिक सहायता देगा।

(iv) इस तरह अप्रैल 1975 में उत्तरी एवं दक्षिणी वियतनाम का एकीकरण हो गया।
अमेरिकी वियतनाम युद्ध के परिणाम

(i) अमेरिकी वियतनाम युद्ध में अमेरिका के 9855 करोड़ डालर खर्च हुए
(ii) अमेरिका के 56 हजार से अधिक सैनिक मारे गए और लगभग 3 लाख सैनिक घायल हुए

(iii) दक्षिणी वियतनाम के 18000 सैनिक मारे गए और अमेरिका के 4800 हेलीकॉप्टर तथा 3600 टैंक नष्ट हो गए

माई-ली-गांव की घटना किसे कहते हैं?
उत्तर– दक्षिणी वियतनाम में एक गांव था जहाँ के लोगों को 1968 में वियतकांग समर्थक मान अमेरिकी सेना ने पूरे गांव को घेर कर पुरुषों को मार डाला, औरतों बच्चियों को बंधक बनाकर कई दिनों तक सामूहिक बलात्कार किया, फिर उन्हें भी मार कर पूरे गांव में आग लगा दिया। लाशों के बीच दबा एक बूढ़ा जिन्दा बच गया था जिसने इस घटना को उजागर किया।

नापाम किसे कहते हैं?
उत्तर– नापाम यह एक तरह का आर्गेनिक कम्पाउंड है जो अग्नि बमों में गैसोलिन के साथ मिलकर एक ऐसा मिश्रण तैयार करता था जो त्वचा से चिपक जाता और जलता रहता था इसका व्यापक पैमाने पर वियतनाम में प्रयोग किया गया था।

एजेन्ट-आरेंज किसे कहते हैं?
उत्तर– यह एक ऐसा जहर था जिससे पेड़ों की पत्तियाँ तुरत झुलस जाती थी एवं पेड़ मर जाता था। जंगलों को खत्म करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता था। इसका नाम आरेंज पट्टियों वाले ड्रमों में रखे जाने के कारण एजेंट ऑरेंज पड़ा। अमेरिका इनका इस्तेमाल जंगलों के साथ खेतों और आबादी दोनों पर जमकर किया।

लाओस में गृहयुद्ध

(i) 1954 में जेनेवा समझौता के बाद लाओस को स्वतंत्र घोषित कर दिया गया। लेकिन 1954 के बाद उत्तरी लाओस के दो प्रांत – फुंगसाली और होऊअफ्रांस पर साम्यवादियों का असर बढ़ गया था। तथा वे अपने प्रभाव को और ज़्यादा फैलाना चाहते थे।

(ii) 1954 के जेनेवा समझौते में यह तय हुआ कि लाओस में शांति बनी रहे। इसके लिए एक त्रिसदस्यीय अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण आयोग (International Control Commission – ICC) बनाया गया। इसमें तीन देश शामिल थे – भारत, कनाडा और पोलैंड। इनका काम था देखना कि समझौते का पालन ठीक से हो रहा है या नहीं।

(iii) लाओस में पहले राजा का शासन था। लेकिन बाद में राजतंत्र हटाकर संसदीय प्रणाली लागू की गई। इससे देश में राजनीतिक अस्थिरता (बार-बार सत्ता बदलना) शुरू हो गई।

(iv) इसके बाद लाओस में तीन सौतेले भाईयों ने राजनीतिक पकड़ के लिए अलग-अलग रास्ते अपना लिए।

(v) पहले राजकुमार सुवन्न फूमा, बीच का रास्ता (तटस्थ) चाहता था। न अमेरिका की तरफ, न रूस की तरफ। दूसरा राजकुमार सुफन्न बोंग (पाथेत लाओ), साम्यवाद लाना चाहता था। तीसरा राजकुमार फुमी नौसवान, दक्षिणपंथ (पूँजीवाद) की तरफ झुका हुआ था और अमेरिका का समर्थन करता था।

(vi) 25 दिसंबर 1955 को लाओस में चुनाव के बाद सुवन्न फुमा के नेतृत्व में राष्ट्रीय सरकार का गठन हुआ।

(vii) पाथेट लाओ ने इसका विरोध करते हुए गोरिल्ला युद्ध शुरू कर दिया परंतु 1957 में दोनों में समझौता हो गया और पाथेट की पार्टी नियो-लियो-हकसत (NLHS) को भी सरकार में जगह मिल गया।

(viii) अमेरिकी षड्यंत्र के कारण दोनों भाइयों में समझौता टूट गया और पुनः गुरिल्ला युद्ध शुरू हो गया। दोनों भाइयों के लड़ाई के बीच तीसरे भाई फूमी नौसवान ने अपना निर्वाचित सरकार बना ली।

(ix) 3 माह के बाद फिर तख्तापलट कर कैप्टन कंगाली के नेतृत्व में सरकार बना परंतु तीनों भाइयों ने मिलकर कैप्टन कांगली को भगा दिया।

(x) तब भारत ने जेनेवा समझौता के अनुरूप अंतराष्ट्रीय नियंत्रण आयोग को पुनजीवित करने की मांग उठायी। अंततः इस समस्या पर 14 राष्ट्रों का एक सम्मेलन बुलाना तय हुआ, जिसमें लाओस के तीनों पक्षों की भागीदारी पर रूस अमेरिका भी सहमत थे।

(xi) 1961 में एक सम्मेलन हुआ जिसमें सभी राजकुमार ने संयुक्त मंत्रिमंडल के गठन पर सहमति प्रदान की और मंत्रिमंडल भी बना परंतु अमेरिकी षड्यंत्र के कारण लाओस के विदेश मंत्री की हत्या हो गई और गृह युद्ध पुनः शुरू हो गया।

(xii) इसके बाद अमेरिका ने चुनाव द्वारा सुवन्न फूमा को प्रधानमंत्री और सुफन्न बोंग को उपप्रधानमंत्री बनाया।

(xiii) 1970 में असंतुष्ट पाथेट लाओ ने आक्रमण कर जार्स के मैदान पर कब्जा किया। और अमेरिका ने भयंकर बमबारी की, लेकिन पाथेट लाओ को रोक नहीं पाया।

कंबोडियाई संकट

(i) 1954 में जेनेवा समझौता के बाद कंबोडिया ने संवैधानिक राजतंत्र को स्वीकार कर नरोत्तम सिंहानुक को शासक बनाया।

(ii) अमेरिका कंबोडिया पर अपना प्रभाव चाहता था इसी कारण नरोत्तम सिंहानुक पर चिढ़ा हुआ था और थाईलैंड के जरिए कंबोडिया पर दबाव बनवाने की कोशिश की।

(iii) 1963 में सिहानूक ने अमेरिका से किसी भी तरह के मदद लेने से इनकार कर दिया, इससे संबंध और ख़राब हुए।

(iv) मई 1965 में अमेरिका ने कंबोडिया के गांव पर आक्रमण कर दिया तो सिंहानुक ने अमेरिका से राजनैतिक संबंध तोड़ लिए।

(v) 1969 में अमेरिका ने कंबोडिया पर जहर की वर्षा हवाई जहाज से करवा दी जिससे लगभग 40 हजार एकड़ रबर की फसल नष्ट हो गई।

(vi) CIA के ज़रिए अमेरिका ने दक्षिणपंथी कंबोडियाई तत्वों को संगठित करके सिंहानुक को हटाने की साजिश की।

(vii) 18 मार्च 1970 को कंबोडिया की राष्ट्रीय संसद ने नरोत्तम सिंहानुक को सर्वसम्मत रूप से हटाया और अमेरिका के समर्थन से लोन नोल के नेतृत्व में सरकार बनी।

(viii) सिंहानुक पेकिंग (बीजिंग) में निर्वासित सरकार बनाकर लोन नोल के शासन को अवैध घोषित किया। उसने संसद भंग कर जनता से नई सरकार का विरोध करने को कहा और अप्रैल 1970 में नरोत्तम सिंहानुक ने नई सरकार के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया।

(ix) अमेरिका और दक्षिणी वियतनाम की सेनाएँ कंबोडिया में प्रवेश कर भारी संघर्ष शुरु कर गईं। तथा नरोत्तम सिंहानुक और अमेरिका की फौज के बीच युद्ध होने लगा।

(x) 16 मई 1970 को जकार्ता में एक सम्मेलन बुलाया गया। 9 अक्टूबर 1970 को कंबोडिया को गणराज घोषित कर दिया गया। परंतु सिंहानुक एवं लोन नोल के सेना में संघर्ष चलता रहा।

(xi) 1975 में नरोत्तम सिंहानुक की लाल खुमेरी सेना ने लोन नोल को भगा दिया। और 1975 में कंबोडिया में गृह युद्ध समाप्त हो गया तथा नरोत्तम सिंहानुक पुनः राष्ट्र अध्यक्ष बने।

(xii) 1978 में नरोत्तम सिंहानुक ने राजनीति से संन्यास ले लिया।तथा कंबोडिया का नाम बदलकर कम्पूचिया कर दिया गया।

(xiii) नरोतम सिंहानुक के बाद खिऊ समफान एवं पोलपोट ने मार्क्सवादी विचारधारा के अनुरूप शासन शुरू किया। 1979 में हैंग सामरीन ने खिऊ समफान एवं पोलपोट ने पराजित कर दिया।

Bharati bhawan

1868 का स्कूलर्स रिवोल्ट (Scholars’ Revolt) = 1868 में विद्वानों और दरबारियों ने ईसाई धर्म और फ्रांसीसी हुकूमत का विरोध करते हुए विद्रोह किया। यह विद्रोह इतना तीव्र था कि कई ईसाई मारे गए।

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दोस्तों उम्मीद करता हूं कि ऊपर दिए गए कक्षा 10वीं के इतिहास के पाठ 03 हिंद-चीन (इंडो-चाइना) में राष्ट्रवादी आंदोलन (Hind Chin me Rashtrawadi Andolan) का नोट्स और उसका प्रश्न को पढ़कर आपको कैसा लगा, कॉमेंट करके जरूर बताएं। धन्यवाद !

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